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बरगद मिला उदास
 

 






 

पत्थर के दिल हो गये, पथरीले आवास
अबकी लौटा गाँव तो, बरगद मिला उदास

फसलें सहमी झुलस कर, काट रही थी दिन
और खेत सूने मिले, हल बैलों के बिन
कुएं खुद ही मर गये झेल झेल कर प्यास
अबकी लौटा गाँव तो, बरगद मिला उदास

उग आईं आँगन कई, मोटी सी दीवार
कितना निष्ठुर हो गया, आपस में परिवार
चिडिया सब चुप हो गई, कग्गे भये निराश
अबकी लौटा गाँव तो, बरगद मिला उदास

रिश्ते बेमानी हुए, सगे सौतेले लोग
स्वास्थ्य से दुश्मनी, घर घर बैटे रोग
दारू पी कर सभ्यता, खेल रही थी तास
अबकी लौटा गाँव तो, बरगद मिला उदास

अपने तक सीमित हुए, जो थे बडे उदार
कैसी शिक्षा पा गये, बदल गया व्यवहार
चावल ढाई हो गया, हुक्के सबके पास
अबकी लौटा गाँव तो, बरगद मिला उदास

--योगेश समदर्शी
६ जून २०११

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