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चंपा महका

 

 
इन नयनों में रात अँधेरी यह चुभती है
इक गहरी सी पीर कहीं मन में बहती है
यह चकवा चकई का जोड़ा पुलकित गाता
हुई रात तो बिछड़े दोनों, मन बिलखाता
अकुलाया सा फिरता, मन यह क्रंदन करता
फीका सा है बाग, आग सा चंदा तपता
इतरायी सी डाली यह चंपा की फिरती
हरी हरी गदराई यौवन के रस भरती
कहीं श्वेत तो कहीं रक्त से पुष्प खिले हैं
पीली पीली चंपा से अब आन मिले हैं
फीके से हैं रंग सभी ये पुष्प न महके
कित ढूँढूँ प्रियतम को बस मन इस पर बहके
तब किरणों में पूरब की इक मुखड़ा चमका
मन उपवन सब खिले और यह चंपा महका

- बृजेश नीरज
१ जुलाई २०१३

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