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चंपा तेरी शान

 

 
प्रेम मधुरता औ खुशी, कोमलता बलिदान।
पाँच पंखुरी में बसे, चंपा तेरी शान।
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मंदिर मठ घर द्वार सजें, भरे आरती थाल।
सौरभ की बाती जले, सजती सुन्दर माल।
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केशों में सुन्दर लगें, नारी का शृंगार।
सुन्दर रूप निखार दें, बहे सुगंध बयार।
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पुष्प-वृन्द ये झूमते, सिर पर सहते ताप।
मधुर सुवासित हों हरें, श्रमितों के संताप।
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श्वेत पीत रक्ताभ से, मोहें सबके चित्त।
परिमल औषधि दान को, खिल उपकार निमित्त।
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-ज्योतिर्मयी पंत
१ जुलाई २०१३

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