अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

चंपा महकी डाल पर

 

 
चम्पा महकी डाल पर, बिखरे रंग हज़ार।
मुदित हुए वन चौपदे, देख सुमन संसार।

कहते चम्पा पेड़ को, जंगल का सिरमौर।
चलता रहता साल भर, गुल खिलने का दौर।

इसके फूलों का बड़ा, अलग एक अंदाज़।
एक वृंत पर हर सुमन, करता एकल राज।

यूँ तो खिलते पुष्प ये, पूरे बारह मास।
लेकिन अंत बसंत का, इनका मौसम खास।

गर्मी इनकी मीत है, इन्हें धूप से नेह।
निखरे तपकर ताप से, कंचन वर्णी देह।

जन जीवन जब जूझता, धूप पसीने संग।
वन्य जीव अठखेलियाँ, करते चम्पा संग।

भँवरों को भाती नहीं, इनकी गंध विशेष।
फिरें उदासी ओढ़कर, ये कलियों के देश।

पुष्प सूखते पेड़ पर, देकर मीठी गंध।
पवन बाँटती विश्व में, इनकी सरस सुगंध।

हरते हैं जन जीव के, जीवन का हर शूल।
अब शूलों से रक्ष हों, ये प्यारे बन-फूल।

जन्नत हो भूलोक पर, अगर हरे हों पेड़।
मीत! कहे यह कल्पना, कुदरत को मत छेड़।

-कल्पना रामानी
१ जुलाई २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter