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 आस्था की सुगंध

 

 
प्रेम की
सहज अभिव्ययक्ति है चंपा
कभी देखा है इसका पेड़
कैसे गुँथे रहते हैं इसके फूल, वृत्तों से
जैसे बरसों से कर रहें हो प्रतीक्षा
किसी के आगमन की
किसी साधिका के समान

किसी ने इसे राधा कहा है
अपनी कविताओं में
शायद इसीलिए कोई भी भौंरा
नहीं कर पाता
मनमानी इसके साथ

कभी चंपा के बागीचों की ओर आना
साधना की मधुरिम सुगंध
कर देगी तुम्हारे हृदय के
तारों को झंकृत

वृंत पर अकेली खिलती है चंपा
हर पल बिखरती है, इसकी श्वेत मुस्कान,
नीले गगन में बिखरी
धवल चाँदनी की तरह
किसी रमणी के मधुहास सरीखा है,
इसका दर्शन,
उसी की तरह सदाबाहर,
तभी तो यह खिलता है, डालियों पर शरमाया सा,
डाली-डाली पर गुँथी, आस्था की सुगंध सा।

- आदित्य शुक्ला
१ जुलाई २०१३

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