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चंपई लम्हे

 

 
वक़्त के
चम्पई लम्हों की दरारों से
झाँकती वो रात
आज बहुत अरसों बाद
ईख की चाशनी से
मेरे अरमानों ने अभिषेक किया

मुझे याद है
जब मैं हर रात
ख्यालों में
एक कील तरह हर वक़्त
साथ उसके धँसा रहता था

बेचैनियाँ इतनी सर्पिल थीं
कि मैं माटी के बिछौने पे भी
तरस के सो नहीं पाता था

उम्र का ये नौसिखिया प्रेम
बिना प्रिय की रातों को
मेरी आँख तक मुँदने नहीं देता था
और मैं फिर
ख्यालों में डूबा
तेरे सायों में चला आता था

वो ठंडक
वो भीगी खुशबू तेरी
बिना निगले कलेजे तक
उतर जाती थी
जैसे मुझे संग बैठने
की इजाज़त मिल गई हो
जिसके संग वक़्त बिताने को
हर लम्हा तरसता था मैं

तेरी छोटी सी काया
मुझे उस वक़्त
बहुत ही विशालकाय
लगती थी
और
मेरे पहलू में गिरे हुए
तेरे चम्पई उपहार
यादों की तरह
बिखरे नज़र आते थे

जिन्हें मैं अक्सर चुनता
अपने आँसुओं से धोता
और गोधूली के समय
वहीं कान्हा के मंदिर में
चरणों में कान्हा के
समर्पित कर देता था
ये बोल के
कि
मेरा ये प्रेम तेरे प्रेम जैसा ही है
इनको महसूस कर
इसे साकार कर
क्योंकि मैं अपनी राधा के बिना
नहीं रह सकता हूँ

आज जब मेरे वो सपने साकार
हो रहे हैं तो
ऐ चंपा के पेड़
मुझे कह लेने दे कि
यह सब
उन्हीं चम्पई लम्हों की देन है
जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता
एक रात आऊँगा
अपनी प्रिय के साथ तुमसे मिलने
बस तू वहीं इंतजार करना...

-अजय ठाकुर
१ जुलाई २०१३
 

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