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चंपा दीवार के पार

 

 
चम्पा तुम तनी
दीवार से लगी खड़ी हो
मानो झाँकती हो
दीवार के पार घर में
जहाँ वो खटती है अहोरात
तुम महकती हो बावली सी
अपने पीले फूलों की कतारों संग
क्या वो भी कभी महकती है?

वो तो
रसोई से आँगन
आँगन से रसोई दौड़ती है
रंगहीन गंधहीन हो कर
तुम घने आतप में भी
खींच लेती हो
गहरे तल से प्राण
वो खुद में घुटती
एक एक साँस पर साँस
धरती है
मानो वो साँसे उसकी आदत
बन गई हो चाह नहीं

चम्पा वो थकी है
एकाकी है
अपने मन के घटक में
उसे अपनी मोहनी में
बाँध लो ताकि
वो भी कर्कश जीवन से
खींच सके मधुर प्राण
और हो सके
आह्लादित।

-अर्चना ठाकुर
१ जुलाई २०१३

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