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आँगन की चंपा

 

 
मेरे आँगन की
नन्हीं चम्पा
खिलने को आतुर दिखती
लेकर अपनी गोद में
प्रकृति उसे सवाँरती

चाँदी जैसा चन्द्रमा
देता उसे है श्वेत वर्ण
सूरज की किरणें सुनहरी
चूम कर देती
उसे पीतवर्ण
रूप रंग प्यारा सा पाकर
स्वर्णमयी श्वेताम्बरी सी
इठलाती हुई सी बल खाकर
झूलती है
डालियों की बाँहों में
चमकते पत्तों की गोद में जाकर
फैला देती सुगन्ध
बहती हवाओं में

सोचती हूँ
आँगन की खिली चम्पा को देखकर
सही मात्रा में धूप,
पानी और खाद पाकर पुष्ट हुई
चम्पा महकती
अपने नन्हें-मुन्ने बच्चों को भी
दूँग़ी मैं भी सही मात्रा में
ऐसे ही अच्छे संस्कार !

-मीनाक्षी धन्वंतरि
१ जुलाई २०१३

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