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चंपा के फूल (पाँच कविताएँ)

 

 

जब तुम मुझे याद करते हो तब
मैं कहीं गुम हो जाती हूँ
महकते हैं उस वक्त सिर्फ
मेरे गुलदान में रखे चम्पा के ढेरों सफ़ेद फूल


तुम्हारे बालों की लटों में टँके
चंपा के फूल
जीवन की महक को ठीक-ठीक पहचानते हैं
या पहचानते हैं
मेरे आस-पास मँडराते प्रेम के ये मासूम फरिश्ते


अमावस्या की एक स्याह काली रात में
मैंने ढेरों चंपा के फूल तारों की तरह ज़मीन पर बिखरा दिये
यकीन जानिए
चंपा के ये फूल ठीक सितारों से चमकते भी रहे
और अपनी भीनी महक के साथ
कई सपनों में गलियों में उतर भी आये


फूल,
धरती की वर्णमाला हैं
हर फूल अपने साथ एक मुहावरा ले कर आया
चंपा के फूल के साथ आयी खुशबू
और
"भँवरे, छलावे का नाम है का स्त्रीवादी उद्घोष"
( चंपा के आस-पास भवरें नहीं मँडराते )


पीली किनारे वाली सफ़ेद साड़ी पहने किस की
इंतज़ार में हो चंपा रानी
सारे मछुआरे तो अपने यात्रियों समेत उस पार उतर गए
और तुम फूल के रूप में महकती ही रही
क्योंकि इंतज़ार,
समुंदर की तरह सिर्फ तुम्हारी ही हरी नसों में बह रहा था

-विपिन चौधरी
१ जुलाई २०१३

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