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फूल चम्पा के सजाकर

 

 
चाँद का टीका लगाकर कौन आया है
फूल चम्पा के सजाकर
कौन आया है

एक पहचानी हुई खु़शबू हवाओं में
दूर तक कोई नहीं लेकिन निगाहों में
उम्र भर एक स्वप्न से रिश्ता निभाया है
भोर की मेंहदी रचाकर
कौन आया है

घंटिया सी बज रही हैं आज फिर तन में
आरती होने लगी भीतर कहीं मन में
दीप की लौ सा नजर में झिलमिलाया है
रात के घुँघरू सजा कर
कौन आया है

सूर्य की पहली किरन सी मुस्कराहट है
मन को विचलित कर रही ये किसकी आहट है
पूर्व के आलोक सा जो मन पे छाया है
घूप का चंदन लगा कर
कौन आया है

सच कहूँ तो आज काबू में नहीं है मन
दूर तक अहसास पर छाया गुलाबीपन
एक मादक स्वप्न आँखों में समाया है
ये निगाहों को झुका कर
कौन आया है

रात का काजल लगा कर कौन आया है
फूल चम्पा के सजाकर
कौन आया है.

-अशोक रावत
१ जुलाई २०१३

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