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चंपा : दो छोटे गीत

 

 
 १. देह चंपा हुई

देह चंपा हुई
छन्द फूटे कई
गन्ध पसरी हुई है बहुत दूर तक।

तुम न आए भ्रमर
इस गली में कभी
तितलियाँ डोलती हैं यहाँ नित नई।

बढ रही है प्रतीक्षा
मुलाकात की
देख तो लो जरा रंग निखरे कई।


२. चंपा मत हो उदास

झूमे केदारनाथ
फैला विकराल हाथ
पसर गया सर्वनाश।

फटा तब वहाँ बादल
मरे अधमरे घायल
बिखरी है रेत प्यास।

प्राचीरें हुईं ध्वस्त
देव, भक्त- अस्त व्यस्त
आँखों में तिरी लाश।

सुख का पल चहकेगा
सावन फिर महकेगा
चंपा मत हो उदास।

- भारतेन्दु मिश्र
१ जुलाई २०१३

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