अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

खिले पुष्प फिर चंपा के

 

 
श्वेत पीत रक्ताभ लिए
खिले पुष्प फिर चंपा के

हरित चुनर पर
जड़े हुए नभ से उतरे तारागण
या कि सागर उर्मियों पर बिखरे मूँगे-मोती कण
भर दे आँचल खुशियाँ से
अपनी धरणी अम्बा के

थाल सजें
पूजा अर्चन देवों को शुभ माल्यार्पण
बालाओं के आभूषण से मुसकाए यह प्रांगण
कवियों के हों प्रेरित मन
घर सौन्दर्य मधुरता के

सिखलाये
जीवन दर्शन दूजों के हित जीने का
रूप रंग खुशियाँ अर्पण इत्र सुवासित मन हरता
जग हित निज प्राण समर्पण
उदाहरण अनुकम्पा के

-ज्योतिर्मयी पंत
१ जुलाई २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter