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चंपा फूला

 

 
चंपा फूला
उधर डाल पर
इधर हमारी देह सिहाई

रचा फागुनी हवा-धूप ने
रितु का अचरज
टेर सगुनपाखी की गूँजी
महका सूरज

नेह-पर्व की
चंपा पर बैठी पिडुकी
दे रही दुहाई

रात चाँदनी
जब चंपा को दुलराती है
नेह-छुवन के गीत
हवा सँग वह गाती है

नदिया तीरे
किसी नाव पर
कोई बजाता है शहनाई

आधी रातों
बिना देह का देवा आता
इच्छापूरन वृक्ष
रोज़ चंपा हो जाता

चंपा में तब
किसी अप्सरा की छवि
देती हमें दिखाई

-कुमार रवीन्द्र
१ जुलाई २०१३

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