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सोन चम्पा महकती रही

 

 

सोनचंपा महकती रही रात भर
चाँदनी सुख की झरती
रही रात भर

गंध उमगी खरी
मन की मटकी भरी
इक झरी पंखुरी थाम अँजुरी धरी
यों  त्रिभंगी  खड़ी,  ताल  की  जलपरी
हाय! सबको लगी मनभरी मनभरी
दीठि नटिनी ठुमकती
रही रात भर

कोई लाकर
सितारे यहाँ रख गया
हौले हल्दी के दीपक जलाकर गया
किसने---केसर---के---पोरों---से---चंदा---छुआ
और चंदन के छींटों से पढ़ दी दुआ
रूप गंधा लहकती
रही रात भर

दंग सावन
ने लहराई अमृत लड़ी
घर नगर द्वार, मंगल धमाचौकड़ी
छूटी बिजली की आकाश में फुलझड़ी
उत्सवों से लदी सोनचंपा खड़ी
धुन सितारों की बजती
रही रात भर

- पूर्णिमा वर्मन
१ जुलाई २०१३

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