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चम्पा के फूल

 

 
जिसे देख सारे दुख जाते थे भूल
मुरझाये आज वही
चम्पा के फूल

आसमान से बरसा पानी या आग
जो कभी न सोये वह पीर गयी जाग
नाव बही हवा चली
कितनी प्रतिकूल

कान हुये बहरे सुन चीखें–चीत्कार
वज्रपात सहने को विवश हैं पहाड़
मौत ने चुभाये हैं
गहरे से शूल

नंगे आकाश तले भूखा परिवार
अन्तिम उम्मीद रही गगन को निहार
देवदूत उतर पड़ें
दुआ हो कुबूल

– रविशंकर मिश्र रवि
१ जुलाई २०१३

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