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बोली चंपा इतरा के जरा

 

 
कल रात की रानी से बोली चंपा इतरा के ज़रा
सुन्दर बराबर फूल मुझसा कोई दिखलाए ज़रा
ईश अनुकम्पा नहीं यदि बाग में चंपा नहीं
और गजरा भी मेरे बिन कब भला भाए जरा

.
कह रही चंपा पथिक बस दूर से ही तुम निहारो
प्रेम से सींचो सदा और नेह रस से तन सँवारो
हर किसी के हाथ में जाना मुझे भाता नहीं
चाँद हूँ बागों की, मुझको दूर से ही तुम दुलारो


- दीपक शर्मा
१ जुलाई २०१३

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