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कली एक चंपा की

 

 
जीवन की पुस्तक जो पलटी मिली कली एक चंपा की
प्रणय निवेदन के स्वागत में रही कली एक चंपा की
मौन थे दोनों ही उस पल में दोनों ही सामर्थ्यहीन थे
सहज कठिन अभिव्यक्ति कर गयी कली वही एक चंपा की


व्यथित ह्रदय जब हो जाता है, मन विस्मृत हो खो जाता है
आशाओं की एक किरण ही, मिल जाये जी ललचाता है
घर के आँगन में चंपा के फूल तभी कहते हैं मुझसे
निश्छल प्रेम पिपासा हरने खुद श्रावण चल के आता है


-पुनीत द्विवेदी
१ जुलाई २०१३

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