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ये चंपा के फूल

 

 
रंग हिना का उतर उंगलियों से गिर गया दूध में शायद
या तिलोत्तमा के चेहरे की परछाईं पड़ गई कमल पर
या हिमांत की खुली धूप की चटकी अँगड़ाई बिखरी है
या फिर अधर कर गये अंकित, अपने चिह्न किसी पाटल पर


मंडप से उठ रही दुल्हन के पाँवों की पड़ गई छाप क्या
ये चम्पा के फूल वाटिका में लगता ऐसे मुस्काये
जैसे धर कर देह आ गई सारंगी से उभर रागिनी
या फिर मधुर प्रीत में रँगकर गीत किसी पाखी ने गाये


-राकेश खंडेलवाल
१ जुलाई २०१३

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