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भीना भीना चंपावन

 

 
सुधियों की तितली ने परसा जब बोझिल मन का सूनापन।
दृश्य दृश्य हो कर सजीव सा सँवर गया बन नंदन कानन।
खिले श्वेत फूलों सी पावन जब ममता मस्तक तक आयी।
मन आँगन में लहका-महका तब भीना भीना चम्पावन।


लिख भेजा संदेशा बदली ने पावस का नम झोंकों पर।
दिशा दिशा आह्लादित कण कण नृत्य कर रहा पुलकित हो कर।
झूम झूम चम्पा ने खोले अतुलनीय भण्डार सुरभि के।
कर शृंगार श्वेत पुष्पों से कहा सु स्वागत प्रिय मित्रवर।


बादलों के सख्त पहरों की दीवारें तोड़ कर।
श्वेत पुष्पों का अलौकिक छद्मकारी वेशधर।
हो रहा आभास जैसे डोर थामे मेह की।
आ गए चम्पा की डालों पर सितारे हो निडर।

-सीमा अग्रवाल
१ जुलाई २०१३

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