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ओ चंपा ओ करबी

 

 
सहसा डालपाला तोर उतला जे ओ चांपा, ओ करबी

ओ करबी, ओ चंपा, चंचल हौठीं तेरी डालें ।
किसको है देख लिया तुमने आकाश में

जानूँ ना जानूँ ना ।।
किस सुर का नशा हवा घूम रहा पागल,
ओ चंपा, ओ करबी ।
बजता है नुपुर ये किसका जानूँ ना ।।

क्षण क्षण में चमक चमक उठतीं तुम ।
करती हो रह रह कर ध्यान भला किसका ।।
किसके रंग हुई बेहाल फूल फूल उठती हर डाल ।
किसने है आज किया अदभुत्त ये साज जानूँ ना ।।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर
(मूल बांगला रूपांतर : प्रयाग शुक्ल का है)
१ जुलाई २०१३

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