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झरे झरे री हरसिंगार

 

झरे-झरे री हरसिंगार बन, मन-वृन्दावन झरे
मरे-मरे री विगलित मन की ईर्ष्या-अनबन मरे

झर-झर झरे देह का भादों-लथपथ गगन बहे
सिमटे-भीगे वस्त्र धाम अंतर से सर्जन बहे
ख़ुशबू की बौछार मारता सन-सन पवन बहे
दूर देश का मेघ मिला है,अब तो कहन कहे

मसृण-कृष्ण कुंचित कुन्तल पर मोती अगिन झरे
झरे-झरे री हरसिंगार बन, मन वृन्दावन झरे

हरित-अंबरा, वह सितंबरा, ठुमक-ठुमक पग दे
बिजली फेंके आसमान से, इंद्र वज्र रख दे
फटे रात का बुर्का काला, सुबह योग तज दे
घटा घोर, शहज़ोर-चोर री, चाहे जो कर दे

नई मल्लिका के शबाब का कुसुमित चमन झरे
झरे-झरे री हरसिंगार मन, मन वृन्दावन झरे

- राम मेश्राम
१८ जून २०१२

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