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रात भर हरसिंगार झरे

 

गंध मदिर बिखरे
रात भर
हरसिंगार झरे

श्वेत रंग
की बिछी चदरिया,
शोभित हरी घास पर हर दिन
चुन चुन हार गूँथ कर मालिन,
डलिया खूब भरे,
रात भर
हरसिंगार झरे

सिंदूरी
वृन्तों पर खिलती
छह छह श्वेत पंखुरी सुरभित
स्व सौंदर्य भार से गर्भित
औंधे मुँह गिरे
रात भर
हरसिंगार झरे

-शारदा मोंगा
१८ जून २०१२

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