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फूल कनेर के
 
किसने रोके पाँव अचानक
धीरे-धीरे टेर के।

उजले-पीले भर आए
आँगन में फूल कनेर के।

दिन भर गुमसुम सोई माधवी
तनिक नहीं आभास रहा
घिरा अँधेरा खूब नहाई
सुगन्ध- सरोवर पास रहा।

पलक बिछाए बिछे धरा पर
प्यारे फूल कनेर के।

मन बौराया चैन न पाए
व्याकुल झुकती डाल-सा
पीपल के पत्ते सा थिरके
हिलता किसी रूमाल-सा।

चोर पुजारी तोड़ ले गया
प्रातः फूल कनेर के

- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
१६ जून २०१४

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