अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

पलाश जंगल में दहके 

.
जिस दिन पलाश
जंगल में दहके
तुम आ जाना!

नववर्ष हर्ष उत्कर्ष
बहारों ने नापे!
हलदी वाले हाथों ने
दरवाजे छापे!

जिस दिन मौसम की गायक
कुहु कुहु कुहुके
तुम आ जाना!

सिल पर पिसते रंगत लाते
गहरे होते!
इंद्रधनुष जैसे
सपनो में ठहरे होते

जिस दिन मुंडेर पर
कोरी चूनर बहके
तुम आ जाना!

झरझर झरते रंग
झोंके रस गंधो के
जिस दिन ऊँची मेडों पर
किंशुक लहके
तुम आ जाना!

निर्मला जोशी
२० जून २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter