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पीपल की फुनगी पर
 
 

पीपल की फुनगी पर
नीलकंठ का जोड़ा
जब नीड़ नया बुनता है तृण से
तब भोर उगे पीपल अक्सर बातें करता है मुझसे।

लहरों सी उठती गिरती डाली जब
सन्देश क्षितिज का लाती है
पीपल के पत्तों की शहनाई
बिसमिल्ला खाँ की याद दिला जाती है।

शाम ढले तोतों का झुण्ड
जब पत्तों में छिप जाता है
रोज सवेरे गुड़ल फल चख
दूर गगन उड़ जाता है
हुक्के की गुड गुड में,
रोज चौपालें सजती हैं
बैठ उसी के नीचे महुआ
एक कहानी गुनती है।

सावन में जब झूले पड़ते हैं
पींगों में, ख़्वाब रोज नए सजते हैं।
शाम ढले तब प्रेम कहीं जग जाता है।
एक नई इबारत
पत्तों के झुरमुट पर लिख जाता है
तब पीपल अक्सर बातें करता है मुझसे

-मंजुल भटनागर
२६ मई २०
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