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पेड़ का दुःख
 

मुझे
रोक लिया था
कल पीपल के पेड़ ने
और कहा था
देखो मेरी तरफ
मैं वही पेड़ हूँ
जिसकी टहनियों पर लटक कर
तुम इतने बड़े हुए।
तुम गिरे थे मेरे तने से
कई बार
चढ़े थे कई बार।

तुम्हारे नन्हें पैरों की
गुदगुदाहट
अभी भी मुझे याद है;
तुम खेला करते थे कुराँडंडी
तपती दुपहरी में
फिर सोते थे गहरी नींद
मेरे बदन की छाया में।
मैं कितना खुश रहता था
तुम्हारे साथ।

ये जो खुदे नाम
तुम देख रहे हो
यह तुम्हारे ही खोदे हुए है
मैंने इन नामों को
बहुत सहेज कर रखा है

अनायास
पीपल का पेड़ कराहा
और कहने लगा
क्या हो गया है तुम्हें और तुम्हारे शहर को?
क्यों नहीं तोड़ते मेरी टहनियाँ और पत्ते
उन पर क्यों नहीं लटकते
तुम्हारे बच्चे?

सच पूछो तो
मेरा तना
आजकल
बहुत तड़फता है
टहनियाँ उदास रहती हैं
नन्हें हाथों और पैरों के
कोमल स्पर्श के लिए।

भाई्!
कहो ना अपने बच्चों से
मेरे पास आएँ
'भले ही ठोक जाएँ
अपने नन्हें हाथों से एक कील
या खोद जाएँ अपना नाम
मेरे बदन पर।

बहुत उदास था
पीपल का पेड़ रूआँसा हो कर
देख रहा था
छत पर लगे डिस्क एण्टीना को
और कान पर लगे मोबाईल को
मन ही मन बुदबुदा रहा था
इसी ने छीनी है मेरी खुशी
मेरे बच्चे मुझसे।

-नरेश मेहता
२६ मई २०१४

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