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कवच
 

मेरी जड़ों ने थामे रखा
गंगा जमुना की तहजीब को
मेरी कोंपलों के फूटते ही
शुरू हो गए
मेरे सिरहाने ईश्वर के वास

मैंने पहुंचाई मन्नतों की आवाज़
नक्कारखाने के बाहर
वहां तक जहाँ आस्था की कचहरी लगती थी
डोरियों के नेह बंधे रहे मेरी भुजाओं पर

हरी चादर में ढंके रहे
परित्यक्त ईश्वरों के चित्र
पीढी दर पीढी
मेरे तने में बहता देहरस
आश्वस्ति पाता रहा
एक अद्रश्य जिन्न के अस्तित्व से

सभ्यता की दीवारों की दरारों में
मैं बच गया हूँ
एक जिद्दी गरीब बच्चे की तरह
न मिट्टी की ममता न खनिजों का पोषण
हरिया रहा हूँ उतना ही
जितना काट दिया जा रहा हूँ

मैं जाना चाहता हूँ
चिड़ियों की चोंच में उड़कर
अस्तित्व का युद्ध लड़ते जंगलों में
एक गुमनाम पेड़ होकर
खड़ा होना चाहता हूँ उसकी सीमाओं पर
न जलाये न काटे जाने की
आस्थाओं का कवच बनकर
ताकि बचे रहें
धरती की सांस में आकाश
और वनों की जड़ों में मिट्टी.

-परमेश्वर फुँकवाल
२६ मई २०१४

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