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पीपल की छाँह तले
 
 

भरी दोपहरी में
प्याज़ तोड़ कर
है रोटी खाता
पीपल की छाँह तले
श्रमिक सुस्ताता

इसकी शाखाएँ
जैसे माँ की बाहें
इसकी जड़ें लगती
साँसों की राहें

जन जन का तो
खुला मंच है यह
वनों का पावन
रंगमंच भी यह

इसे संभालो
तीज त्योहार पर
झूले डालो
करो संरक्षण
हो जाएगी तब
धरती कंचन

डॉ सरस्वती माथुर 
२६ मई २०१४

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