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पीपल
 

उस बूढे़ पीपल को
आज भी थी प्रतीक्षा
उस पल की
कि उसकी विशाल बाहों में
गूॅंजें आज भी किलकारियाॅं
सुग्गे, कोयल, गौरैया,
बाज, कबूतर, बटेर, सोनचिरैया
किधर गये सब
आमंत्रित करता गिद्धराज को
आज भी वो वृद्ध पीपल।
साॅझ के समय तकते रहते
झुकाये पलकें वो पात
चबूतरे को अपलक
जिस पर लगी रहती थी अक्सर
बैठकें बुजुर्गो की
बाॅटते रहते दुख-सुख
छोड़ जाति-पात
लेते आशीष और प्राणवायु
होते स्वस्थ और निष्पाप।
बाॅंटने को बाट जोहता
वृद्ध पीपल
अपना सारा प्यार, दुलार, ज्ञान, विज्ञान
बोध, निवार्ण और ब्रह्मज्ञान
परन्तु कोई लगाए जो ध्यान
कौन बनना चाहता है बुद्ध, शुद्ध, और भगवान
करता वो बोधिवृक्ष आवाहन
एक शंका और मूकप्रश्न
क्यो कहते हैं लोग
पीपल पे रहता है शैतान
नही कर पाये क्या आज तक ये पहचान
कौन ईश्वर, कौन मनुष्य और कौन शैतान
आओ मै देता हॅू चेतना का, सुख का,
निर्माण का, निर्वाण का, आत्मज्ञान,
प्रतीक्षा है आज भी उस वृद्ध पीपल को
कोई आये, ले जाये और बन जाये
महान |

-उमेश मौर्य
२६ मई २०१४

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