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पीपल के बिछोह में
 

खोया कहीं बचपन तरुणाई के मोह में
छोड दिया गाँव जब जीविका की टोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

पीपल चौंतरे पर छुटपन के पैंतरें थे,
पातों के छातों पर, और और छाते थे
पीपल की छाँव तले, कितने अरमान पले
छनती हुई धूप में, पर्ण पर्ण पवन झले

दूर कहीं इठलाती, मधुवन की जोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

देववृक्ष अश्वत्थ के देवतुल्य प्रभाव से
अनुष्ठान पूर्ण हुए कई अपने गाँव के
प्रभुराम कथा वाचन या धर्म कर्म प्रवचन
चले नवदंपती हों महकाने निज उपवन

बैठना पीपल तले जब भी उहापोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

याद रहा पीपल को गाँव का अतीत सभी
थक कर जो बंद हुई तब की वो रीत सभी
पीपल की मूल फैली खेतों औ’ बागों में
पवन को दिये सुर कितने ही रागों के

संग सदैव गाँव के आरोह अवरोह में
आकुल अनाथ रे मन
पीपल के बिछोह में

-ओंम प्रकाश नौटियाल
२६ मई २०१४

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