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पथ निहारता रहता पीपल
 

डरे न आँधी तूफानों से,
आश्रय को नहिं करे मना।

जीवन संघर्षो में बीते,
हम भी पीपल जैसै जीते,
चूर-चूर हो जाते अक्सर,
कष्ट कभी जब पड़े घना।

पीपल पात बिछड़ जाता है,
साथ छोड़ जब वो जाता है,
शाख, शाख से रोये लिपटे,
आँखों को बेहाल बना।

पल-पल बस पीपल ही पीपल,
जिसे देख मन होता शीतल,
कैसे समझे ये मन-मानस,
रुके न आँखों का झरना।

काट दिये जड़ तने कभी जब,
पूछ रहे हैं, कैसे हो अब ?
पीपल चुप हो झेल गया सब
इस दुनिया का हाल घिना। 

- पवन प्रताप सिंह पवन
२६ मई २०१४

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