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पेड़ पीपल के
 

 

ताप सहकर, छाँह देते, पेड़ पीपल के
हैं कि जैसे माँ–पिता से, पेड़ पीपल के

राह, बस्ती, बीहड़ों में, साधना में रत
वीतरागी से अनूठे, पेड़ पीपल के

लड़ रहे हैं, आग बोते भानु से, तनकर
ढाल, पत्तों के हरे, ले पेड़ पीपल के

धूप के तपते मरुस्थल में, थके तन को
छाँव की शीतल नदी से, पेड़ पीपल के

ले लंगोटी आस्था की, हैं दुआ देते
साधु औघड़ से खड़े,ये पेड़ पीपल के

बाँटते अमृत, जहर पीकर फ़जाओं का
देव, शंकर ज्यों निराले, पेड़ पीपल के

सुब्ह के भूले परिंदे, आयेंगे शब को
जोहते हैं बाट, सूने पेड़ पीपल के

– कृष्णनन्दन मौर्य
२६ मई २०
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