अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

पीपल के तले के पल
 

 
चली आई मेरे उर में , तुम्हारी याद की डोली।
उठाकर नैन उन्मीलित , लरजते प्यार से बोली।
हैं तुमको याद, वो पीपल तले के पल, तो मैं बोला-
हिमालय हो गया तुम बिन निमिष भी काटना भोली।

तुम्हारे पाँव की पायल, झनक कर पास आती है।
मिलन की कामनाओं से, सुलगती साँस लाती है।
हरित पीपल की छाया के, धुँधलके में थमी घड़ियाँ,
मधुर उन्माद परिपूरित, उदित मधुमास लाती हैं।

नहीं है उम्र कम लेकिन, बहुत भोले हैं दिल के वो।
मिले पीपल तले हम से, तो कहते हैं हया से वो।
चलो हम देख लेते हैं, उलाहना रोज जिस का है,
दिखाओ दर्देदिल अपना,जिसे हर रोज कहते हो।

सुनाना हाल-ए-दिल था बस, बयां आँखों ने कर डाला।
उन्हें दिल से लगाना था, झिझक बांहों ने कर डाला।
मुहब्बत के फसाने को, ज़ुबां से कब कहा किस ने,
रहे पीपल तले चुप हम, जो कहना था वो कह डाला।

झुका कर शोख नजरों को, अदा से आँख झपकाना।
पकड़ कर शाख पीपल की, वो मेरी ओर झुक जाना।
अजाने सिर्फ छूने से, सुनामी तेज साँसों की तुम्हारी ,
मुझे है याद वो अब भी, तेरा मुझ से लिपट जाना।


राज सक्सेना राज

२६ मई २०
१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter