पत्र व्यवहार का पता

अभिव्यक्ति तुक-कोश

१. ३. २०१६

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देखा है लोगों को हमने

 

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देखा है लोगों को हमने
गिरगिट जैसे रंग बदलते
पल में तोला, पल में माशा
बहुरूपी दरपन सा छलते

गाजर घास उगी मन मधुबन
क्षीण कर रही कोमल काया
नागफनी के पेड़ लगाकर
ढूँढ रहे हैं शीतल छाया

षड्यंत्रों की पगडण्डी पर
आशा के दीपक को जलते

दरवाजे पर आँख गड़ाकर
कानाफूसी करते हैं दिन
कुशल क्षेम संबोधन भूले
तरकश में रख लेते हैं पिन

नई हवा की रंगरेलियाँ
लज्जा के आँचल को ढलते

अंग अंग चन्दन सा महके
तन गोरा, पर मन है काला
आस्तीन का साँप बने, वो
अंहकार की पहने माला

दाँव-पेंच में, उलझी साँसें
आँखों में कटुता को पलते
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- शशि पुरवार

इस पखवारे

गीतों में-

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शशि पुरवार

अंजुमन में-

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विजयप्रताप आँसू

छंदमुक्त में-

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मीना चोपड़ा

मुक्तक में-

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बसंत शर्मा

पुनर्पाठ में-

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प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव

पिछले पखवारे
१५ फरवरी २०१६ को प्रकाशित

गीतों में-

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राजेन्द्र प्रसाद सिंह

अंजुमन में-

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महावीर उत्तरांचली

छंदमुक्त में-

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हरीश सम्यक

दोहों में-

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सपना मांगलिक

पुनर्पाठ में-

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डॉ. धर्मेन्द्र पारे

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संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

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