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अनुभूति में ओमप्रकाश खुराना 'आतिश' की रचनाएँ-

अंजुमन में—
जाने पहचाने

नगमे हमेशा
बरसता अब्र है
मुझको यहाँ
सारे जहाँ पे राज मेरा
 

  मुझको यहाँ

मुझको यहाँ तो हर कोई अपना लगा
सपना हकीकत और सच सपना लगा

मैंने बढ़ाया गुल की जानिब हाथ जब
काँटा जो उसके साथ था, वो आ लगा

बैठा है शीशे के मकां में आदमी
हर दम ही पत्थर का अंदेशा लगा

अख़त्यार है किसको यहाँ दिल पर भला
जो भी लगा अच्छा, उसी से जा लगा

अब रो रहा है रख जिगर पर हाथ क्यों
'आतिश' न दिल, कितना ही समझाया, लगा

९ जुलाई २००६

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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