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अनुभूति में यतीन्द्रनाथ राही की रचनाएँ

गीतों में-
अभिसार वाले दिन
आबरू घर की
आँख में
उमर को बाँध लो
कहाँ गए
कुछ रुक लो
ख़त में तुमने भेज दिया
चलो चल दें
झर गए वे पात
दिन गए रातें गईं
दूर देश की चित्र सारिका
मधुकलश मधुमास
सज गई है
हमारे रेत के घर
हो गया है प्राण कोकिल

संकलन में-
होली है- दिन होली के

       दिन हुरियारे आए

वसंती हवा- आएँगे ऋतुराज
         आए हैं पाहुन वसंत के


 

 

चलो चल दें

चलों! चल दें
कहीं शायद
हमारा द्वार मिल जाए।

ग़ज़ब की आँधियाँ हैं
गगन से बारूद झरता है
दिशाएँ
भाँप कर चुप हैं
समय का कदम डरता है
किसे मालूम
अपनी आस्तीनें ही
हमें डस लें,
हमारी फूल मालाएँ
बनें फंदे
हमें कस लें
दहकती आग से शायद
कोई कुंदन निकल आए।

चमन को बेचकर
जो खा रहे हैं
बागवाँ तो हैं
वतन को,
तोड़ते, जो बाँटते हैं
रहनुमा तो हैं
हमी ने प्यार खोए
दर्द रोपे
नफ़रते बोईं
हज़ारों बार हम पर
आदमीयत तड़प कर रोई
कहीं इन दलदलों के बीच
कोई कमल खिल जाए।

९ जून २००८

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