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अनुभूति में सरोजिनी प्रीतम की
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सूली तथा अन्य हँसिकाएँ

सूली

तिलक माला लाये, किया चंदन से अभिषेक
बलि के बकरे सी हुई, दुल्हन की गति देख
खुशी से फूली फूली
चढ़ेगी हँस-हँस सूली

अस्थि-कलश

अस्थि-कलश में
तत्काल सेवाओं के, स्पष्ट हुए तब अर्थ
डोली अस्थि-कलश में, तुरंत हुई परिणत
तकि गंगा स्नान को जाएँ
प्रवाहित कर के आयें

सिक्के

अध्यापिका ने छात्रों को
'सोलह आने सच' का मुहावरा
जब बार बार समझाया
'आने' के पुराने सिक्के के बारे में बतलाया
तो 'आने के सिक्के-जाने के सिक्के'
कह-कह कर छात्र हँसे
सिर पीटकर अध्यापिका बोली
'छोड़ो यह मुहावरा
वे सोलहों आने तो खर्च हो चुके।'

अर्घ्य

चाँद पर पानी का सुनते ही
वैज्ञानिक की पत्नी बोली
ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है।
जिसे आप लोग अपना अविष्कार समझकर
श्रेय ले रहे हैं
वस्तुतः करवा चौथ के दिन, हम जो चाँद को
अर्ध्य देती रहीं...वह यही है।

शालीन

सौर उर्जा अधिकारी
उनकी उम्र के बारे में पूछने से सकुचाये
शालीनतावश बोले-
‘आपने बाल-धूप में सफेद किये
या-धूप में सुखाये?’

यान्त्रिक

आदर्श विवाह का मूलमंत्र
दूल्हा- माँ बाप के लिए श्रवण कुमार हो
-पत्नी के लिए श्रवण यन्त्र।

गुण

उसने सहेली से कहा
मेरे पति बहरे हैं यह तो मुझे
छः महीने बाद पता चला
सहेली हँस कर बोली यों
बोलने का मौका देकर देख लो
शायद गूँगे भी हों।

दलाल

उसने उनसे उनके व्यवसाय की बात पूछी
बोली- घर की मुर्गी दाल बराबर
और आप दाल के व्यपारी...छि...छि...

अनुपात

डयोढ़ी में उम्र भर खड़ी रही निगोड़ी
पिया जो आये तो मिलने को दौड़ी
लाज से दुहरी हुई छरहरी काठी
ढाई आखर प्रेम की यही परिपाटी
दोनों ज्यों नहले पे दहला
डेढ़ पसली का मजनूँ - जीरो फिगर की लैला

बादशाह

दबंग पत्नी ने ताश खेलते समय
पति को इशारे से कहा 'स्थिति साफ है
एक जगह मैं हूँ,
तीन जगह आप हैं’

वाह! कह कर उछले। पत्ते फेंक दिेये
तो ज्यों संबंधों के पत्ते खुले
एक जगह बेगम - तीन जगह गुलाम मिले।

दर्पण

साहित्यकार पति ने कहा
साहित्य को सब अर्पण है
साहित्य समाज का दर्पण है
दर्पण सुनकर वे बोली
'ठीक है इससे ज्यादा सिर मत फोड़ना
और हाँ एकाध दर्पण
मुँह देखने के लिए भी रख छोड़ना।


चाल

पति बोले
चींटी की चाल चलकर भी तुम्हारी सहेली
अपने लक्ष्य तक जा पहुँची, कमाल है...
भन्ना कर पत्नी बोली-
'चींटी की, चींटी चाल में भी, चींटी की चाल है।'

वर्ग

उनके प्रवचन सुनकर भक्त ने पूछा
आप इससे पहले ज्यामिति के अघ्पापक थे क्या?
क्योंकि...
तब आप वर्ग की बातें करते थे
और अब अपवर्ग की।


चेला

नई पीढ़ी का चलन देखकर
खिन्न मनसा बोली-
यह पीढ़ी संस्कार और परम्पराएँ
कहाँ निभायेगी
शरीर चोला बदलता रहेगा
अत्मा मर जाएगी

फल

आज की पीढ़ी कितनी तेज है
सब्र का फल मीठा लेकिन उन्हें मीठे
से परहेज है।

तथ्य

तुलसीदास कालिदास
पत्नियों के तानों के कारण- इतनी ऊँचाइयों तक जा पहुँचे
साहित्य में उन्हें तो ख्याति मिली
किन्तु उनकी पत्नियों की सबने यों तो
भर्त्सना बार बार की-
वस्तुतः तथ्य तो यही
सौ सुनार की तो एक नार की।


१५ अप्रैल २०१६

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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