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देवदारु तो गुरुकुल है
 

देवदार साधक सा जीवन
हो तो कोई बात बने

कोख पर्वतों
की निकले हैं
सतर खड़े मुसकाते हैं
हिम को ओढ़ें और बिछाएँ
फिर भी कब
दु:ख पाते हैं

अंतस में जाने
क्या है पर
देह सुबह सी कोमल है
अचल रहे हैं तूफ़ानों में
मन भी तो कब
डुलमुल है

हम भी देवदार हो जाएँ
तो फिर ऐसा गात बने

आपाधापी चहूँ
ओर है
जीवन पतझर आज हुए
पीड़ा के हैं ताजमहल सब
दिन भी जैसे
बाज़ हुए

हर मौसम में
रहें गमकते
देवदार तो गुरुकुल हैं
जीवन को परिभाषित करते
मन उनके तो
बुलबुल हैं

लो दीक्षा आँखें
उनसे फिर
सपनों की बरसात बने
देवदार साधक सा जीवन
हो तो कोई
बात बने

- गीता पंडित  
 
१५ मई २०
१६

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