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अप्रतिम बंधन

 

शंख ध्वनियों ने पुनः वो
प्रण कहा है कान में
बंधनों में अप्रतिम बंधन
सजा है हाथ में

श्लोक में हैं
शब्द सब कल्याण के ही
शब्द मूरत
सब बने विश्वास के ही
माथ पर
सौभाग्य का कुंकुम सुशोभित
शीश पर
अक्षर पड़े हैं नेह के दो

कामनाएँ
शुभ समय की
बहन की मुस्कान में

हाथ में बस
सूत की राखी नहीं है
जन्मना अधिकार
अपने भ्रात पर है
भ्रात सम्मानित
करो सब भगनियों को
भ्रात निर्भय
अब करो सब स्त्रियों को

ले लिया इक
वचन अबकी
बहन ने उपहार में

- नीरज द्विवेदी
१५ अगस्त २०१६

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