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अनुभूति में अशोक वाजपेयी की रचनाएँ-
एक बार जो
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प्यार करते हुए सूर्य–स्मरण जब मेरे होठों पर तुम्हारे होंठों की परछाइँयाँ झुक आती हैं और मेरी उँगलियाँ तुम्हारी उँगलियों की धूप में तपने लगती हैं तब सिर्फ आँखें हैं जो प्रतीक्षा करती हैं मेरे लौटने की उन दिनों में, जब मैं नहीं जानता था कि दो हथेलियों के बीच एक कुसुम होता है – सूर्यकुसुम जब अँधेरे दरवाजे पर खड़े होकर तुम एक गीत अपने कंधों से मेरी ओर उड़ा देती हो और मैं एक पेड़ की तरह खड़ा रहता हूँ तब सिर्फ आँखें हैं तब प्रतीक्षा करती हैं मेरे लौटने की उन दिनों में, जब मैं नहीं जानता था कि दो चेहारों के बीच एक नदी होती है –सूर्यानदीॐ जब तुम मेरी बाँहों में साँझ–रंग–सी डूब जाती हो और मैं जलबिंबों–सा उभर आता हूँ तब सिर्फ आँखें हैं जो प्रतीक्षा करती हैं मेरे लौटने की उन दिनों में, जब मैं नहीं जानता था कि दो देहों के बीच एक आकाश होता है – सूर्यआकाश १ दिसंबर २००१ |