गुझिया पसंद है

 

 
गुड़िया को गुझिया पसन्द है
गुड्डे को लाल गुलाल
सुन्दर ढाँचे में भर मिठास
ले आती हर साल

नेह प्रीत के खोये के संग
भरे भाव बादाम
मटक मटक कर खूब नाचती
छनती घी के गाम
अर्द्धचन्द्र सा रूप सजाए
बनती एक मिसाल

सोंधी माटी सी खुशबू से
बन जाती है खास
होंगे रिश्ते सरल मनोहर
बंध जाती यह आस
गले लगाकर चाँद सितारे
अम्बर बने विशाल

कभी तिकोना रूप धरे
कभी है वृत्ताकार
रूप सरस की बनी माधुरी
गुझिया बनी बहार
खुशी खुशी खेलो सखि होरी
कर दो जग खुशहाल

-ऋता शेखर 'मधु'
१ मार्च २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter