अपनी नजर बदल सकते हैं

 

 
कोरेण्टाइन नहीं टल सकता
अपनी नज़र बदल सकते हैं
आओ कुछ पल सब ये देखें
कैसे जीवन जश्न हो गया

भारी काम हुआ अब हल्का
हल्का हल्का सबका मन है
लूडो कैरम और ताश पर
ही होती अब हर अनबन है
घर भर की ज़िम्मेदारी में
पूरा घर संलग्न हो गया

सात्विक भोजन सात्विक जीवन
इस अभाव ने सिखा दिया है
अपने घर का घरवालों का
स्थान सभी को दिखा दिया है
साँसें लेने लगा शौक वो
कभी कहीं जो दफ़्न हो गया

बाहर घूमा करते थे जो
घर की खातिर घर बिसराकर
दौड़ धूप आपाधापी में
अंतर्मन का चैन गँवाकर
जाने कैसा ये सुकून है
लुटकर मन सम्पन्न हो गया

शांत भाव से बैठे बैठे
सहसा मन चिंतित हो उठता
क्या होगा जाने अगले पल
इस खयाल से कुढ़ता घुटता
नीरवता है या कोलाहल
यक्ष सरीखा प्रश्न हो गया

- निशा कोठारी
१ जून २०२०
 

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