मातृभाषा के प्रति


हिंदी मातु हमारी

कह दो पुकार कर, सुन ले दुनिया सारी।
हम हिंद-तनय हैं, हिंदी मातु हमारी।।

भाषा हम सबकी एक मात्र हिंदी है।
आशा हम सबकी एक मात्र हिंदी है।।
शुभ सदगुण-गण की खान यही हिंदी है।
भारत की तो बस प्राण यही हिंदी है।।

हिंदी जिस पर निर्भर है उन्नति सारी।
हम हिंद-तनय हैं, हिंदी मातु हमारी।।

कविराज चंद ने इसको गोद खेलाया।
तुलसी, केशव ने इसका मान बढ़ाया।।
रसखान आदि ने इसको ही अपनाया।
गाना इसमें ही सूरदास ने गाया।।

गांधी जी इस मंदिर के हुए पुजारी।
हम हिंद-तनय हैं, हिंदी मातु हमारी।।

भारत ने अब इसके पद को पहचाना।
अपनी भाषा बस इसको ही है माना।।
इसका महत्व अब सब प्रांतों ने जाना।
दक्षिण भारत, पंजाब, राजपुताना।।

सब मिलकर गाते गीत यही सुखकारी।
हम हिंद-तनय हैं, हिंदी मातु हमारी।।

सदियों से हमने भेद भाव त्यागे हैं।
पा नवयुग का संदेश पुन: जागे हैं।।
अब देखेगा संसार कि हम आगे हैं।
जगकर हम रण से कभी नहीं भागे हैं।।

फिर आई है, हे जगत, हमारी बारी।
हम हिंद-तनय हैं, हिंदी मातु हमारी।।

(खरी बात, 1935 में लाहौर से प्रकाशित)

-प्रो. मनोरंजन
16 सितंबर 2006

 

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