मातृभाषा के प्रति


उड़ने को तैयार

परंपरा की
घनी धरोहर और
प्रगति से प्यार
हिंदी अपने पंख फैलाए
उड़ने को तैयार

फूल फूल में कली कली में
घर आंगन में गली गली में
फूल उठा है
मधुर गंध से
जिसका अमित दुलार
जिसमें अच्छे लगते अपने
उत्सव तीज त्योहार

जन गण मन की अभिलाषा है
कोटि प्रयत्नों की आशा है
शिक्षा और
धनार्जन में भी
इसका हो आधार
हिंदी पढ़ने लिखने वाला
कभी न हो बेकार

आसमान तक उड़ कर जाए
हिंदी अपना ध्वज फैलाए
शांति छाँह में
मिल कर बैठे
दुखिया यह संसार
विश्व प्रेम की पंखुरियों का

गूँथें अनुपम हार

-पूर्णिमा वर्मन
16 सितंबर 2007

 

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