मातृभाषा के प्रति


हिंदी ने हमको एक रखा

हिंदी ने हमको एक रखा आज़ादी का उपहार दिया

संस्कृत की पावन धारा से हिंदी ने नव आकार लिया।
हिंदी ने हमको एक रखा आज़ादी का उपहार दिया।।

वैसे तो हम कई बातों को बिन बोले भी कह जाते हैं।
और मूक बधिर अपनी भाषा में मन के भाव बताते हैं।।
भारत की पावन माटी में जाने कितनी भाषाएँ हैं।
पर हमें राष्ट्रभाषा हिंदी से कई उज्जवल आशाएँ हैं।।

भारतेंदु, प्रसाद ने हिंदी को कई रत्नों का भंडार दिया।
हिंदी ने हमको एक रखा आज़ादी का उपहार दिया।।

कवि दिनकर, गुप्त, महादेवी की अमर ऋचाएँ हिंदी में।
कवि माखनलाल चतुर्वेदी की सब रचनाएँ हिंदी में।।
आगे फिर इसे निराला ने छंदों से मुक्त बनाया है।
बच्चन ने अपना अमर काव्य हिंदी भाषा में गाया है।।

पर इसे विवेकानंद ने पहले सात समुंदर पार किया।
हिंदी ने हमको एक रखा आज़ादी का उपहार दिया।।

हम राष्ट्र भारती हिंदी की घर-घर में अलख जगाएँगे।
हम हिंद निवासी हिंदी को दुनिया भर में महकाएँगे।।
हिंदी भाषा है सहज सरल जो सबके मन को भाती है।
इसमें इतना अपनापन है सबके मन को छू जाती है।।

सब मंत्र मुग्ध हो जाते हैं जब हिंदी स्वर झंकार दिया।
हिंदी ने हमको एक रखा आज़ादी का उपहार दिया।।

जो राष्ट्र स्वयं की भाषा को मन में स्थान नहीं देता।
उसको कोई भी अन्य देश समुचित सम्मान नहीं देता।।
है राष्ट्र हमारा एक राष्ट्रीय भाषा केवल हिंदी है।
भारत माँ के उज्जवल ललाट पर शोभित सुंदर बिंदी है।।

हम कोश बढ़ाएँ हिंदी का जिसने सपना साकार किया।
हिंदी ने हमको एक रखा आज़ादी का उपहार दिया।।

सजीवन मयंक
16 सितंबर 2006

 

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