मातृभाषा के प्रति


 

सहर्ष अपनाएँ

स्वरों व्यंजनों से परिनिष्ठित है वर्णों की माला,
शब्द-शब्द अत्यंत परिष्कृत देते अर्थ निराला
उच्च कोटि के भाव निहित हैं, नित प्रेरणा जगाए।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

व्यक्त विचारों को करने का यह सशक्त माध्यम है,
देवनागरी लिपि अति सुंदर सर्वश्रेष्ठ उत्तम है
इसकी हैं बोलियाँ बहुत-सी इसे समृद्ध बनाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

उच्चारण, वर्तनी सभी में, इसको सिद्धि मिली है,
है व्याकरण परम वैज्ञानिक, पूर्ण प्रसिद्धि मिली है
इसके अंदर संप्रेषण का अनुपमेय गुण पाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।

हिंदी सरल, सुबोध, सरस है नहीं कहीं कठिनाई
जो भी इसे सीखना चाहे, लक्ष्य मिले सुखदाई
काम करें हम सब हिंदी में इसकी ख्याति बढ़ाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

कवियों ने की प्राप्त प्रतिष्ठा, रच कविता कल्याणी,
गूँज रही है अब भी उनकी, पावन प्रेरक वाणी
हम इसकी साहित्य-संपदा भूल न किंचित जाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

ओजस्वी कविताएँ लिखकर अमर चंदबरदाई,
अमिट भक्ति की धारा तुलसी ने सर्वत्र बहाई
सूर, कबीर, जायसी की भी कृतियाँ हृदय लुभाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

केशव, देव, बिहारी भूषण के हम सब आभारी,
रत्नाकर, भारतेंदु उच्च पद के सदैव अधिकारी
महावीर, मैथिलीशरण, हरिऔध सुकीर्ति कमाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

पंत, प्रसाद, महादेवी का योगदान अनुपम है,
देन 'निराला' की हिंदी को परम श्रेष्ठ उत्तम है
दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्र-भक्ति उपजाएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

करें प्रयोग नित्य हिंदी का, रक्खें अविचल निष्ठा,
ऐसा करें प्रयास कि जिससे जग में मिले प्रतिष्ठा
हिंदी का ध्वज अखिल विश्व में मिलजुल कर फहराएँ।
आओ आओ हिंदी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ।।

-विनोद चंद्र पांडेय विनोद
16 सितंबर 2005

 
 
 

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