होली
है
!!

 

 

 

 

होली तो हो ली


 

नैनों के खारे फव्वारों की होली।
खेलो, न खेलो! होली तो हो ली।

दशानन अवध के सिंहासन चढ़ा है,
डुलाता चँवर राम पीछे खड़ा है।
लखन घिस रहा बैठकर लाल चंदन,
भरत पादुकाएँ लिए सो रहा है।

फटी है सिया की चुनरिया व चोली,
खेलो, न खेलो! होली तो हो ली।

लुटेरे लगे लूटने दिन-दहाड़े,
दिखाकर छुरे, बम, तमंचे, कुल्हाड़े।
हुई आज गांधी-सरीखी ग़रीबी,
लंगोटी पहन, लाज अपनी उघाड़े।

लगा लो इसे राख या रंग-रोली,
खेलो, न खेलो! होली तो हो ली।

महाभोज होने लगा तिलचटों में,
बँटा देश बाज़ीगरों में नटों में।
बजी भूख की ढपलियाँ मरघटों में,
हुई प्यास रुसवा नदी-पनघटों में।

मुहर्रम-सरीखी लगे आज होली,
खेलो, न खेलो! होली तो हो ली।

भुवनेश कुमार
१७ मार्च २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics