होली
है
!!

 

क्षणिकाएँ


बुरा न मानो होली है
भिगोइए गाढ़े रंगो में
यही ठिठोली है!

सघन संवेदना प्रचंड पराक्रम
के रंगो से ऐसी होली खेली,
नफरत की होलिका
जलकर राख हो गई
अपने ही षडयंत्र में।

अबीर, गुलाल, रंग
सब महगे, शेष
कीचड जब जी चाहा
किसी पर उछाल दिया।

बृजेश कुमार शुक्ल

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