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पिता के लिये
पिता को समर्पित कविताओं का संकलन
 

 

क्या पापा वाकई नहीं रहे

पापा, क्या वाकई आप नहीं रहे?
फिर अपनी हर समस्या का निदान
कैसे मिल जाता है -
कैसे हर अभेद्य स्तिथि से
निकास मिल पाता है -
विषम से विषम परिस्थिति में
आप ही की सीख राह दिखाती है -
बड़ी से बड़ी तक़लीफ में
आपकी सांत्वना ही
ढ़ाढ़स बँधाती है -
कड़ी से कड़ी परीक्षा में
आप ही का विश्वास -
मुझे जिताता है -
मेरे शीश पर आपका हाथ
आत्म विश्वास जगाता है -
जब भी मन किसी बात से
हो आहत-
हर पीड़ा हर कष्ट को
आपका स्मित हास

बिसराता है -
आज भी !..आठ साल पश्चात भी!
फिर कैसे मान लूँ -
आप हमारे बीच नहीं रहे!

- सरस दरबारी
१५ सिंतंबर २०१४

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