यों ही नहीं राम जा डूबे

 

यों ही नहीं राम जा डूबे
सरजू जी के घाट !

दिन भर राजपाट
की खिटखिट जनता के परवाने
मातहतों का कामचोरापा, फिर धोबी के ताने
लोग समझते राजा जी तो
भोग रहे हैं ठाट !

था आसान
कहाँ त्रेता में भी तब राज चलाना
शेर और बकरी को पानी एक घाट पिलवाना
ऊपर से भरमाने वाले
कितने चारण-भाट !

हारे-थके
महल में पहुँचें तो सूना संसार
सीता की सोने की मूरत दे सकती न प्यार
ऐसे में क्षय होना ही था
वह व्यक्तित्व विराट !

-ओमप्रकाश तिवारी
१ अप्रैल २०१९

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